Wednesday, 19 October 2022

स्त्रियां

कुछ स्त्रियां बंजर होती जाती है
खेतों की भांति
जिन्हें नहीं मिलती 'खाद'
वो जो समझे की,
क्यों ख़त्म हो रहीं इसकी क्षमताएं
क्या हैं नहीं जो समय के साँचो में
इनके पास से छीन लिया गया
सबसे अधिक प्रेम करने वाली
क्यूँ एकांतवास में उदासियाँ सी
रहने लगी
क्यूँ समंदर हो गई खारे पानी का
जो किसी झड़ने सी आयीं थी
क्यूँ मुरझा गईं वक़्त से पहले कितनी
जिसपर भँवरों का बैठना लगा हीं रहता था
क्यूँ बन गयी दासी अपने हीं
बसाय घरों की
अपने बच्चों से भी बिछोह कर के,
जी लेती है स्त्रियां एक समय बाद
जो पहले गर्भ में फ़िर छाती से
लगाए हीं घूमती जाती थी
एक वक्त के बाद ना उम्मीद सी
बस पकाती हैं रोटियां
स्त्रियां बुढ़ापे तक ख़ीर पकाएं
तो समझना की खाद डाली जा रहीं है
उसके सपनों को ज़िंदा रखने में
किसी ने मेहनत की हैं
किसी ने उसके प्रेम को अपने प्रेम से
सिंचना छोड़ा नहीं है.

Saturday, 15 October 2022

मौन की गूंज

कुछ नहीं बचेगा गर 
मौन रह जाएगा चारों ओर अकेला मौन
ख़ामोशी और गूंज एक साथ अजीब सिहरन पैदा करेगी
जमा देगी ईश्वर का ख़ून मंदिरों में,
पशु पक्षी गूंजेंगे 
फिर भी सन्नाटा होगा 
नहीं होगी इंसानों की प्रजाति
जो शोर करती हैं और सूना पन भी देती है
कितनी अजीब बात है~
विरानिया जिनके लिए हो
रौनक उन्हीं से हुआ करती है ना?

मर्द जाती

मर्द जाती
कोल्हू के बैल 
जो पिस्ते है सरसों,
जोते है खेत
बोझा लाद कर 
आदम के वंशज का
ढोते है पीठ पर स्त्रियों के सौख
बदले में लालच 
प्रेम पा लेने की
स्वीकृति पा लेने की
ईज़्ज़त पा लेने की
मगर होते है बैल
स्त्री ना चाहें तो
बैल कभी नहीं बनेगा
बाप-भाई, प्रेमी-पति
जिज्ञासू बैल आदमी
नहीं समझता जीवन राग
नहीं समझता पहेलियां
नहीं बनना चाहता भगवान
बस निभाता है तो कुछ जिम्मेदारी
बन कर रहना चाहता है ता-उम्र बैल
और उसे आदमी बनाती स्त्रियां
प्रेम से सींचती जाती.
आलिंगन देती है स्त्रियां
संवारती है उसको
और वो बना रहता है कठोर बैल

Saturday, 13 April 2019

Ram- ramayana

भीतर के 'प्रकाश' स्वयं के
धैर्य के दो हीं नाम
राम सिया के मध्य में
निहित जीवन ज्ञान
तप,त्याग,वचन,धैर्य,लोकलाज
रिश्तों में भी मर्यादा थी
युग  तो था अनेक रानियों का
पर एक विवाह का सिया वादा थी
पी संग वन जाने को आतुर थी
प्रभु जान रहे सब करें थे
चिंता थी कि चौदह बरस की
पर राज भोग ना जीवन कारण थी
मान रखन को साधु का
लक्ष्मी ने रेखा लांघ दिया
रावण का लिखा विनाश जो था
कारण स्वयं नारायणी ने दिया
फ़िर रचा भीषण संग्राम
जब मिल गए राम हनुमान
विजय पताका था लहराया
तब पानी पर सेतु बनाया
सिया की ली गई अग्नि परीक्षा
सिया ने ना कोई प्रश्न उठाया
प्रेम की लीला थीं कि वह
सिय को अयोध्या ले जाते
धर्म था ये की जा कर के
वो पावन है सबको बतलाते
पर होना था युग का अंत
उस वक़्त भी मैला मन था कुछ का
एक धोबी कि मलीन दृष्टि थी
माता पर संदेह किया
फ़िर राजा को था फ़र्ज़ निभाना
पड़ा सिया को वन में जाना
लभ कुश जन्माई माई ने वन में
दिखा दिया अबला नहीं माई
अपनी लड़ाई स्वयं लड़ी
लव कुश को दिया संस्कार
बेटे ने फ़िर जग में घूम कर
निंदा किया सबका हीं अपार
धर्म सिखाया युद्ध सिखाया
मां ने सिखाई मर्यादा
त्याग की मूरत नहीं झुकी फ़िर
अयोध्या को फ़िर ना अपनाया
अंत हुआ दुराचारी का अंत हुआ वह काल
धरती से जन्मी धरती में मिली
और मिल गए फ़िर सीता राम

                प्रज्ञा ठाकुर©     

Wednesday, 26 December 2018

दिसंबर में तुम्हारी याद लाज़िमी है! ©

दिसंबर में तुम्हारी याद लाज़िमी है
तुम मेरी तन्हाई के इकलौते वारिस हो जिसे हम अब ये देना चाहेंगे ।
तब जबकि दिसंबर सर्द होकर भी मुझे महसूस नहीं होने दे रही अपनी उपस्थिति क्यूंकि मैंने ख्यालों का एक मौसम रचा है जहां तुम मेरी जान, मेरे साथ रहते हो !
जब भी ठंडी हवा दूर से मेरे पास आती है तुम्हारी नज़र जो कि मेरे बालो पर है वो उस ठंडी हवा को मुझे छूते देख लेती है ।
तुम मुझपर अपना एकाधिकार समझते हो तो उस हवा से जब मेरी लटे उड़ती है तुम मुझे अपने और करीब ले आते हो
तुम मेरी उंगलियों को अपनी उंगलियों से बांध लेते हो वहीं सात जन्म वाले फेरों की गांठ के जैसे और अपने सीने से लगा लेते हो ।
हम हैरान से होकर तुम्हारी पेशानी का सबब पूछते है
तुम उदास हो कर कहते हो कितने दुश्मन है जालिम हम दोनों के दरमियान
जो अक्सर मुझे तुमसे छीनने में लगे है .
तुम सारे खिड़की दरवाजे बंद कर देते हो पर्दा लगा देते हो और रौशनी का कतरा जो ये महसूस कराता है कि अभी भी दिन है उसकी ओर इशारा करके कहते हो 'हमें बस इतनी जरूरत इस जहान की ना कम ना ज्यादा',
की मुझे तुम्हारा चेहरा बस साफ़ नज़र आए मुस्कुराते हुए ।
तुम्हारे गुलाबी होठ दिखते रहे ।
मुझे तुम्हारी सांसो की आवाज़ सुनाई दे और
ये गर्म सांसें यही जो मेरे गालों से टकराती है, जो तुम्हारे भीतर से छन के आती है यहीं हवा चाहिए।
हां तो अब ये दिसम्बर मुझे उसी ख़्वाब गाह तक सीमित रखती है
जहां एक मेरी ख़ुद की दुनियां है तुम्हारे साथ की जिसमें तुम्हारी बातें और मेरी तन्हाई है।


©प्रज्ञा ठाकुर

तुझे ज़िंदा देखना था ! ©

वो इस बात पे हैरान है की मैं खुश क्यों  हूँ?
मैं तो खुश हूँ की उसे, हैरान देखना था
उसने जिस तरह से छोड़ा मुझे बीच राह में,
मुझे घर लौट कर, उसको परेशां देखना था
उसने मेरा दिल जलाया की उसे फर्क न पड़ा
मुझे ये आग बुझा कर, उसे हवा देखना था
मेरी ख़ुशी माना की रुख से विदा हो गयी लेकिन,
मुस्कुराने का हुनर बचा था उसे जो परेशां देखना था
क्या सोचता है मेरे यार जुलाहे की मैं मुर्दा हूँ?
सच कहूं तो हूँ क्यूंकि तुझे ज़िंदा देखना था

©प्रज्ञा ठाकुर

Thursday, 20 December 2018

मेरे शहर अज़ीज़ ! ©


अरे मेरे खुशनुमा शहर
मेरी दिलरुबा वादियां
मेरे महबूब हवाएं
तुम उदास हो, की हम है
कोई कुछ तो बतलाये
यादें तमाम छोड़ गए थे
तुम्हें तन्हा कहां छोड़ा ?
हम जो नहीं थे शहर में
तो भी रिश्ता कहाँ तोड़ा?
कहों ख़फा हो क्या ?
या किसी और से दिल लगा लिए
हम यहाँ के पहले से है
तुम 'उसे' तो नहीं अपना लिए
की अबकी जो हवाएं चल रही
जाने कुछ उदास सी है
अपना शहर है की नहीं ?
कुछ अनकही प्यास सी है
देखो अगर तुमने उसको अपना मान लिया
तो कहते है बगावत होगी
गर जो मुझे भूल कर उसके रंग में हो
तो खुदा कसम क़यामत होगी
वो पास है तेरे ए मेरे शहरे अज़ीज़
मगर तू तो मेरा है दिल ए रक़ीब
उसके रंग में बहना मत वो बेवफा है
तुम बस मेरे हो उससे मुझे शिकवा-गिला है
मैं आयी हूँ तो मुझसे ज़िंदगी ले लो
उसका क्या है वो तो जिद्दी सिरफिरा है
मैं तुमसे दूर होकर भी तुम्हें भूलती नहीं हूँ
वो तो दिलफ़रेब कल मेरा था आज तेरा है!

©प्रज्ञा ठाकुर

I do understand!!

I look at him in pain, And lightly smile again. He might think I jest, His sorrows, wounds, unrest. I've fought battles on my own, Survi...