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दिसंबर में तुम्हारी याद लाज़िमी है! ©

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दिसंबर में तुम्हारी याद लाज़िमी है तुम मेरी तन्हाई के इकलौते वारिस हो जिसे हम अब ये देना चाहेंगे । तब जबकि दिसंबर सर्द होकर भी मुझे महसूस नहीं होने दे रही अपनी उपस्थिति क्यूंकि मैंने ख्यालों का एक मौसम रचा है जहां तुम मेरी जान, मेरे साथ रहते हो ! जब भी ठंडी हवा दूर से मेरे पास आती है तुम्हारी नज़र जो कि मेरे बालो पर है वो उस ठंडी हवा को मुझे छूते देख लेती है । तुम मुझपर अपना एकाधिकार समझते हो तो उस हवा से जब मेरी लटे उड़ती है तुम मुझे अपने और करीब ले आते हो तुम मेरी उंगलियों को अपनी उंगलियों से बांध लेते हो वहीं सात जन्म वाले फेरों की गांठ के जैसे और अपने सीने से लगा लेते हो । हम हैरान से होकर तुम्हारी पेशानी का सबब पूछते है तुम उदास हो कर कहते हो कितने दुश्मन है जालिम हम दोनों के दरमियान जो अक्सर मुझे तुमसे छीनने में लगे है . तुम सारे खिड़की दरवाजे बंद कर देते हो पर्दा लगा देते हो और रौशनी का कतरा जो ये महसूस कराता है कि अभी भी दिन है उसकी ओर इशारा करके कहते हो 'हमें बस इतनी जरूरत इस जहान की ना कम ना ज्यादा', की मुझे तुम्हारा चेहरा बस साफ़ नज़र आए मुस्कुराते ...

तुझे ज़िंदा देखना था ! ©

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वो इस बात पे हैरान है की मैं खुश क्यों  हूँ? मैं तो खुश हूँ की उसे, हैरान देखना था उसने जिस तरह से छोड़ा मुझे बीच राह में, मुझे घर लौट कर, उसको परेशां देखना था उसने मेरा दिल जलाया की उसे फर्क न पड़ा मुझे ये आग बुझा कर, उसे हवा देखना था मेरी ख़ुशी माना की रुख से विदा हो गयी लेकिन, मुस्कुराने का हुनर बचा था उसे जो परेशां देखना था क्या सोचता है मेरे यार जुलाहे की मैं मुर्दा हूँ? सच कहूं तो हूँ क्यूंकि तुझे ज़िंदा देखना था ©प्रज्ञा ठाकुर

मेरे शहर अज़ीज़ ! ©

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अरे मेरे खुशनुमा शहर मेरी दिलरुबा वादियां मेरे महबूब हवाएं तुम उदास हो, की हम है कोई कुछ तो बतलाये यादें तमाम छोड़ गए थे तुम्हें तन्हा कहां छोड़ा ? हम जो नहीं थे शहर में तो भी रिश्ता कहाँ तोड़ा? कहों ख़फा हो क्या ? या किसी और से दिल लगा लिए हम यहाँ के पहले से है तुम 'उसे' तो नहीं अपना लिए की अबकी जो हवाएं चल रही जाने कुछ उदास सी है अपना शहर है की नहीं ? कुछ अनकही प्यास सी है देखो अगर तुमने उसको अपना मान लिया तो कहते है बगावत होगी गर जो मुझे भूल कर उसके रंग में हो तो खुदा कसम क़यामत होगी वो पास है तेरे ए मेरे शहरे अज़ीज़ मगर तू तो मेरा है दिल ए रक़ीब उसके रंग में बहना मत वो बेवफा है तुम बस मेरे हो उससे मुझे शिकवा-गिला है मैं आयी हूँ तो मुझसे ज़िंदगी ले लो उसका क्या है वो तो जिद्दी सिरफिरा है मैं तुमसे दूर होकर भी तुम्हें भूलती नहीं हूँ वो तो दिलफ़रेब कल मेरा था आज तेरा है! ©प्रज्ञा ठाकुर

तुम्हारी वेदना

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सोचो ना कितना प्यार है मुझमें जहां भी तुम्हारा जिक्र होता है मैं खामोशी से सुनती हूं और कोई शिकायत भी नहीं करती जानती हूं कि वो मेरा दिल दुखाते है तुम्हारी बातें कर के लेकिन मुझे तुम्हारे नाम में खो जाने की आदत है मैं उनकी बातें नहीं सुनती बस तुम्हारा जिक्र सुनकर खो जाती हूं उन्हीं लम्हों में जब तुम कुछ कहते थे मैं कुछ कहती थी कोई किरदार बुनती थी मैं तुम किस्से गढ़ते थे पागल हो तुम, तुमने कभी जुबान से आंखें बयान हीं नहीं की मैं बुझती गई तुम्हारी वेदना और सीलती गई ख़ुद के ज़ख्म तुम खुश तो हो ना? तुम्हारा जिक्र यूं बेवजह नहीं होता.© प्रज्ञा ठाकुर

हालात- ए - इश्क़ !©

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हालात- ए - इश्क़ - एक कसक है जो ठंडी नहीं  होती कुछ उमस है जो भीनी- भीनी  सुलगती बज़्म में लोग भी शामिल है ऐसे , किनारे मिलते नहीं नदी के , जिन्हें आदत है कहने की , झोंका है हवा का वक़्त- ए -काफ़िर दगाबाज़ दरियाँ जो डूबकर उभरने नहीं देती अमावस जैसी रात बीच -बीच में , हर पहर आती है इश्क़ उस बेवा से हालात है जो ख़ुद मर कर भी सवरने नहीं देती शायरी कविता गीत ग़ज़ल , सब मेरे किस्से ही तो हैं लोगों से दाद जो मिलती है मुझे , मेरी आह उसे मुझ तक पहुँचने नहीं देती!! ©प्रज्ञा ठाकुर