A word creates a line in my mind, then by getting entangled in that line, I go out to find poetry.
Sunday, 13 November 2022
मुकम्मल ईश्क
LIFE- has deeper meanings
दीवाने बाबू की नीलू
Wednesday, 19 October 2022
स्त्रियां
कुछ स्त्रियां बंजर होती जाती है
खेतों की भांति
जिन्हें नहीं मिलती 'खाद'
वो जो समझे की,
क्यों ख़त्म हो रहीं इसकी क्षमताएं
क्या हैं नहीं जो समय के साँचो में
इनके पास से छीन लिया गया
सबसे अधिक प्रेम करने वाली
क्यूँ एकांतवास में उदासियाँ सी
रहने लगी
क्यूँ समंदर हो गई खारे पानी का
जो किसी झड़ने सी आयीं थी
क्यूँ मुरझा गईं वक़्त से पहले कितनी
जिसपर भँवरों का बैठना लगा हीं रहता था
क्यूँ बन गयी दासी अपने हीं
बसाय घरों की
अपने बच्चों से भी बिछोह कर के,
जी लेती है स्त्रियां एक समय बाद
जो पहले गर्भ में फ़िर छाती से
लगाए हीं घूमती जाती थी
एक वक्त के बाद ना उम्मीद सी
बस पकाती हैं रोटियां
स्त्रियां बुढ़ापे तक ख़ीर पकाएं
तो समझना की खाद डाली जा रहीं है
उसके सपनों को ज़िंदा रखने में
किसी ने मेहनत की हैं
किसी ने उसके प्रेम को अपने प्रेम से
सिंचना छोड़ा नहीं है.
Saturday, 15 October 2022
मौन की गूंज
मर्द जाती
Saturday, 13 April 2019
Ram- ramayana
भीतर के 'प्रकाश' स्वयं के
धैर्य के दो हीं नाम
राम सिया के मध्य में
निहित जीवन ज्ञान
तप,त्याग,वचन,धैर्य,लोकलाज
रिश्तों में भी मर्यादा थी
युग तो था अनेक रानियों का
पर एक विवाह का सिया वादा थी
पी संग वन जाने को आतुर थी
प्रभु जान रहे सब करें थे
चिंता थी कि चौदह बरस की
पर राज भोग ना जीवन कारण थी
मान रखन को साधु का
लक्ष्मी ने रेखा लांघ दिया
रावण का लिखा विनाश जो था
कारण स्वयं नारायणी ने दिया
फ़िर रचा भीषण संग्राम
जब मिल गए राम हनुमान
विजय पताका था लहराया
तब पानी पर सेतु बनाया
सिया की ली गई अग्नि परीक्षा
सिया ने ना कोई प्रश्न उठाया
प्रेम की लीला थीं कि वह
सिय को अयोध्या ले जाते
धर्म था ये की जा कर के
वो पावन है सबको बतलाते
पर होना था युग का अंत
उस वक़्त भी मैला मन था कुछ का
एक धोबी कि मलीन दृष्टि थी
माता पर संदेह किया
फ़िर राजा को था फ़र्ज़ निभाना
पड़ा सिया को वन में जाना
लभ कुश जन्माई माई ने वन में
दिखा दिया अबला नहीं माई
अपनी लड़ाई स्वयं लड़ी
लव कुश को दिया संस्कार
बेटे ने फ़िर जग में घूम कर
निंदा किया सबका हीं अपार
धर्म सिखाया युद्ध सिखाया
मां ने सिखाई मर्यादा
त्याग की मूरत नहीं झुकी फ़िर
अयोध्या को फ़िर ना अपनाया
अंत हुआ दुराचारी का अंत हुआ वह काल
धरती से जन्मी धरती में मिली
और मिल गए फ़िर सीता राम
प्रज्ञा ठाकुर©
I do understand!!
I look at him in pain, And lightly smile again. He might think I jest, His sorrows, wounds, unrest. I've fought battles on my own, Survi...
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वो इस बात पे हैरान है की मैं खुश क्यों हूँ? मैं तो खुश हूँ की उसे, हैरान देखना था उसने जिस तरह से छोड़ा मुझे बीच राह में, मुझे घर लौट कर...
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© Two souls meet, One’s like a burning flame, One’s like Water, Both burn and extinguish Sometimes fire extinguishes Sometime...