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Ram- ramayana

भीतर के 'प्रकाश' स्वयं के धैर्य के दो हीं नाम राम सिया के मध्य में निहित जीवन ज्ञान तप,त्याग,वचन,धैर्य,लोकलाज रिश्तों में भी मर्यादा थी युग  तो था अनेक रानियों का पर एक विवाह ...

दिसंबर में तुम्हारी याद लाज़िमी है! ©

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दिसंबर में तुम्हारी याद लाज़िमी है तुम मेरी तन्हाई के इकलौते वारिस हो जिसे हम अब ये देना चाहेंगे । तब जबकि दिसंबर सर्द होकर भी मुझे महसूस नहीं होने दे रही अपनी उपस्थिति क्यूंकि मैंने ख्यालों का एक मौसम रचा है जहां तुम मेरी जान, मेरे साथ रहते हो ! जब भी ठंडी हवा दूर से मेरे पास आती है तुम्हारी नज़र जो कि मेरे बालो पर है वो उस ठंडी हवा को मुझे छूते देख लेती है । तुम मुझपर अपना एकाधिकार समझते हो तो उस हवा से जब मेरी लटे उड़ती है तुम मुझे अपने और करीब ले आते हो तुम मेरी उंगलियों को अपनी उंगलियों से बांध लेते हो वहीं सात जन्म वाले फेरों की गांठ के जैसे और अपने सीने से लगा लेते हो । हम हैरान से होकर तुम्हारी पेशानी का सबब पूछते है तुम उदास हो कर कहते हो कितने दुश्मन है जालिम हम दोनों के दरमियान जो अक्सर मुझे तुमसे छीनने में लगे है . तुम सारे खिड़की दरवाजे बंद कर देते हो पर्दा लगा देते हो और रौशनी का कतरा जो ये महसूस कराता है कि अभी भी दिन है उसकी ओर इशारा करके कहते हो 'हमें बस इतनी जरूरत इस जहान की ना कम ना ज्यादा', की मुझे तुम्हारा चेहरा बस साफ़ नज़र आए मुस्कुराते ...

तुझे ज़िंदा देखना था ! ©

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वो इस बात पे हैरान है की मैं खुश क्यों  हूँ? मैं तो खुश हूँ की उसे, हैरान देखना था उसने जिस तरह से छोड़ा मुझे बीच राह में, मुझे घर लौट कर, उसको परेशां देखना था उसने मेरा दिल जलाया की उसे फर्क न पड़ा मुझे ये आग बुझा कर, उसे हवा देखना था मेरी ख़ुशी माना की रुख से विदा हो गयी लेकिन, मुस्कुराने का हुनर बचा था उसे जो परेशां देखना था क्या सोचता है मेरे यार जुलाहे की मैं मुर्दा हूँ? सच कहूं तो हूँ क्यूंकि तुझे ज़िंदा देखना था ©प्रज्ञा ठाकुर

मेरे शहर अज़ीज़ ! ©

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अरे मेरे खुशनुमा शहर मेरी दिलरुबा वादियां मेरे महबूब हवाएं तुम उदास हो, की हम है कोई कुछ तो बतलाये यादें तमाम छोड़ गए थे तुम्हें तन्हा कहां छोड़ा ? हम जो नहीं थे शहर में तो भी रिश्ता कहाँ तोड़ा? कहों ख़फा हो क्या ? या किसी और से दिल लगा लिए हम यहाँ के पहले से है तुम 'उसे' तो नहीं अपना लिए की अबकी जो हवाएं चल रही जाने कुछ उदास सी है अपना शहर है की नहीं ? कुछ अनकही प्यास सी है देखो अगर तुमने उसको अपना मान लिया तो कहते है बगावत होगी गर जो मुझे भूल कर उसके रंग में हो तो खुदा कसम क़यामत होगी वो पास है तेरे ए मेरे शहरे अज़ीज़ मगर तू तो मेरा है दिल ए रक़ीब उसके रंग में बहना मत वो बेवफा है तुम बस मेरे हो उससे मुझे शिकवा-गिला है मैं आयी हूँ तो मुझसे ज़िंदगी ले लो उसका क्या है वो तो जिद्दी सिरफिरा है मैं तुमसे दूर होकर भी तुम्हें भूलती नहीं हूँ वो तो दिलफ़रेब कल मेरा था आज तेरा है! ©प्रज्ञा ठाकुर

आज कि नारी का योग्य स्वरूप ।©

मैं सती हूं पर असीम ऊर्जा का स्रोत नहीं, मैं पराजित हूं जो पति के सम्मान के लिए अपनी क्रोध को नियंत्रित ना कर पाने पर आत्मदाह कर लेती है और सीता हूं घूम-घूम कर अपने हर बात की सफाई देती है लोगों को की इसका ये अर्थ है आपने गलत समझा माने अग्नि परीक्षा तो मेरा दूसरा रोज़गार है  मैं राधा हूं जिसे रुक्मणि बनने की ख्वाहिश थी पर भगवान बना दिया गया और गंगा हां , गंगा का अपना कोई अस्तित्व नहीं वो तो पावन हीं है ताकि लोगों के कचरे और पाप धोएं तो मुझे ना अब इन सब से अलग मेरा अस्तित्व और मेरी खुशी नज़र आती है जहां मैं सूर्पनखा हूं मेरा भाई सदैव मेरे लिए तत्पर है मैं पूतना हूं जो मासूम से बाबन देख पिघल गई लेकिन जब उसे मालूम पड़ा कि जिसे वो पुत्र बना कर दूध पिलाना चाहती थी वो विश के लायक है तो उसे दूध में जहर घोल पिला दिया और मैं सुभद्रा हूं जो अर्जुन को लेकर भाग गई द्रौपदी नहीं जो लोक लाज के आगे शहीद हो गई इतना अपमान सहा । मैं कलयुग में हूं और यहां के उसूल मैंने खुद बनाए है हां मैं रुक्मणि और सत्यभामा हूं। राधा , मीरा , सीता ये सब मेरे भीतर है पर बाहर इनकी कोई आवश्यकता नहीं बाहर तो मैं सिर्फ...

तुम्हारी वेदना

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सोचो ना कितना प्यार है मुझमें जहां भी तुम्हारा जिक्र होता है मैं खामोशी से सुनती हूं और कोई शिकायत भी नहीं करती जानती हूं कि वो मेरा दिल दुखाते है तुम्हारी बातें कर के लेकिन मुझे तुम्हारे नाम में खो जाने की आदत है मैं उनकी बातें नहीं सुनती बस तुम्हारा जिक्र सुनकर खो जाती हूं उन्हीं लम्हों में जब तुम कुछ कहते थे मैं कुछ कहती थी कोई किरदार बुनती थी मैं तुम किस्से गढ़ते थे पागल हो तुम, तुमने कभी जुबान से आंखें बयान हीं नहीं की मैं बुझती गई तुम्हारी वेदना और सीलती गई ख़ुद के ज़ख्म तुम खुश तो हो ना? तुम्हारा जिक्र यूं बेवजह नहीं होता.© प्रज्ञा ठाकुर

पहली कमाई - बुद्धि ! ©

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बात उन् दिनों की है जब मेरी उम्र गिनती और पहाड़े सिखने की थी और पहाड़ा किसी पहाड़ की चढ़ाई के जैसे हीं  नामुमकिन सा लग रहा था, ऐसा लग रहा था की सारी उम्र निकल जाएगी पर मुझे याद नहीं होगा 5  के बाद . देश १९९३ की बम ब्लास्ट से जूझ रहा था और कहीं दूर गांव में एक नन्ही बच्ची 7 बजे की पढ़ाई से ख़ौफ खा रही थी, 7  बजते हीं डिबिया की रौशनी में पढ़ाई चालू हो जाती हर रोज़ डिबिया क्यूंकि लालटेन था घर में लेकिन बत्ती बढ़ा के उसे काली कर दी जाती थी और उसमे कागज के टुकड़े दाल दिए जाते थे पढ़ाई से बचने के लिए, तो लालटेन मुझसे दूर टांगा जाता था. कोने में थोड़ी दूर एक लकड़ी की कुर्सी पे दादी बैठती थी छौंकी (पतली लकड़ी ) ले कर,मारती नहीं थी कभी पर ख़ौफ बना रहता था की मार सकती है ! डिबियाँ की रौशनी में हमारी किताबें साफ़ दिखती थी पर आस-पास धुंधला पन था और दादी तक पहुंचते- पहुंचते नज़रों के आगे अँधेरा  छा जाता था वहां एक बात समझ आयी की अगर खुद की आंखे बंद कर लो तो दुनिया में अँधेरा हो जाता है अर्थात दादी अगर हमको साफ़ नहीं दिख रही तो हम भी उसको साफ़ नहीं दिख रहे होंगे ! हम ये भूल जाते थे की हम डिब...